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Monday, January 10, 2022

इंतज़ार

इंतज़ार.......इंतज़ार शीर्षक इसलिए कि अभी कोई ठीक ठाक शीर्षक सूझ नहीं रहा. वैसे भी सब कुछ ठीक ठाक से ज़्यादा कुछ है भी नहीं, कहीं पर भी नहीं।

वक़्त रेत की तरह  मुठ्ठी से फिसलता जाता है, उम्मीदें ताश के पत्तों के महल की तरह बिखरती रहती है, बार-बार...लगातार।

बना रहेगा इंतज़ार, जैसे अब तक था।

हाँ उम्मीद नहीं रहेगी अब के एक दिन अचानक से कोई, कभी नहीं जाने के लिए लौट आए और दिन पलट जाए।

जितना जिसके हिस्से का इंतज़ार था , उतना उसका किया जा चुका। 

ज़िन्दगी किसी बच्चे की मुट्ठी में छुपाई रेत है, 

ताश के पत्तों के महल की मानिंद ख़्वाईशे हैं.

अब फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता किसी चीज़ का ये सोचता हूँ तो लगता है शायद यही ढूंढ रहा था ख़ुद में.

सोचता हूँ कभी फ़र्क पड़ता था ब्लॉक होने से,

किसी के फ़ोन ना उठाने से. अब एक ऊब होती है किसी से बात करने में, किसी से नहीं सब से.

कुछ एक दोस्त हैं जिनसे तबियत मिलती है .

एक है जो बिल्कुल अपने जैसा लगता है, उससे ना रश्क़ होता है ना ऊब. लगता है ख़ुद के हिस्से से बात करना.

एक सिरीज़ आयी थी समानांतर. वैसा ही कुछ.

ज़िन्दगी ठीक चल रही है कुल जोड़ घटाकर.

अब वैसी दीवानगी नहीं होती किसी के लिए, ख़ुद के लिए होता है सबकुछ.

पर ठीक ठीक अब भी नहीं पता कि क्या ढूंढ रहा हूँ. कभी जिसके लिए जीवन का सबकुछ लुटाया जा सकता था अब कुछ ख़ास फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता. 

क्यूँ इतनी पसन्द बदल गयी हर एक चीज़ में.

वैसे तुम्हें बताना बस यह था कि अब सफ़ेद पसन्द नहीं उतना, अब नीला रंग सबसे ज़्यादा पसंद है। मुझे ख़ुद तक पहुँचाने का शुक्रिया।

****

१० जनवरी, 2022

सुबह के ४ बजे


(तस्वीर : साभार internet )


Sunday, November 11, 2018

मैं और दूसरा मैं .

रात के ढाई बजे दरवाज़े पर दस्तक होती है...टक-टक-टक-टक।

अचानक याद आता है कि मेरे कमरे में एक दरवाज़ा है जो मुझे क़ैद करके अपना होना भुला देता है। मैं दरवाज़े की तरफ़ नहीं बड़ता हूँ इस वक़्त कौन आया होगा, मेरा धोका होगा।
मैं अपने चारों और कुछ किताबों को रखकर दुनिया से बहुत दूर निकल चुका होता हूँ।
एक शब्द मन में आता है.....प्यास।
मैं मटके की तरफ़ बढ़ता हूँ, वहाँ रखे हुए आईने पर नज़र पड़ती है। चेहरे को छू कर देखता हूँ, बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी और कई सारी झुर्रियां। याद नहीं आता पिछली बार कब ठीक से संवारा था ख़ुद को। तुम्हारे जाने और फिरसे लौट आने के बीच कई बार ख़ुद से झगड़ा हुआ और फिर एक नाउम्मीदी हो गयी ख़ुद से। तबसे ख़ुद की तलाश में हूँ। एक बच्चा जिसे भीड़ से डर लगता था, अब भीड़ के सामने खड़ा होता है तो लोग झूम जाते हैं। पर वो बच्चा सच में खो गया है। उसका होना ये नहीं था कि उसे नाम मिले अख़बारों और दुनिया से पहचान मिले, वो लोगों में उस बच्चे को ढूंढ रहा है जो उसने कहीं अनजाने में पीछे छोड़ दिया।
तुम्हारे जाने और लौट आने तक के सफ़र में उसने ख़ुद को कहीं रख दिया और भूल गया वो जगह जहाँ रख छोड़ा था।

सामने दीवार पर कुछ चुनिंदा तस्वीरें लगी हैं, जिनमें ज़िन्दगी की कई सच्चाइयाँ एक शुरुआती सफ़र उम्मीदों से भरा हुआ, वक़्त के पैरों के निशान जिनमें वक़्त से मिली हुई दुत्कार,, और एक उदास सूखा हुआ पेड़ है। दीवारों पर सीलन लग चुकी है बारिश की वजह से।
ठीक वैसी जैसी मन की दीवारों पर है।
बाकि सब बेजान।

अचानक दरवाज़े पर फ़िर दस्तक होती है इस बार मैं उठकर जाता हूँ दरवाज़ा खोलता हूँ और सामने ख़ुद को पाता हूँ।
मैं अपना स्वागत करके ख़ुद को ख़ुद के पास बिठाता हूँ। मैं और पुराना मैं एक-दूसरे को बहुत ग़ौर से देखते हैं।
मैं दूसरे मैं को अपनी एक ग़ज़ल सुनाता हूँ वो ''मैं'' कोई ख़ास जवाब नहीं देता कहता है- तुम अब वो मैं नहीं रहे, मैं तुमसे मिलने आया था, मुझे पता था तुम मुझे ढूंढ रहे हो'' और अचानक उठकर बाहर निकल जाता है, उसे रोकता नहीं हूँ । मैंने उसे जाने दिया फिर बाहर गया, उसे आवाज़ लगाई,, सुनों तुम कहाँ रहने लगे आजकल।
वो ''मैं'' पलटकर कहता है
'' मैं कुछ सालों से तो .......''

अचानक अलार्म बजती है और नींद टूटती हैं।।

-न से नितेश

Thursday, March 15, 2018

हम हारे हुए लोग है..

"जब हार रहे हो तो जानबूझकर गिर जाओ, बहाना तो मिल ही जाता है।"
..फिर एक दिन ऐसा कोई बहाना करके हम ख़ुद पर झूठा गर्व जताते है। एक दिन वो वादे भी भूला दिए जाते है, जिसे भविष्य की सबसे मज़बूत नींव समझ लेते है।
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फेसबुक का On This Day वाला फीचर कभी-कभी बुरी यादों को भी सामने ला खड़ा कर देता है।
     जिसे हमें भूलने में अरसा लगा हो वो बातें भी हम नहीं भूल सकते। दरअसल हम भूलें ही नहीं थे, हम ढोंग कर रहे होते है।
हम बड़े हो चुके होते है उन "नादानियों"(?) के लिए कहीं भी जगह नहीं बचा पाते....।
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सब खेल रास्तों का होता है और एक छोटी-सी गड़बड़ी से तय होता है ..वो जो शायद नहीं होना था या होना था..??
  हम कभी सोच नहीं पाते कि सही क्या है..फिर स्वीकार करने के सिवा कोई चारा नहीं होता तो चुपचाप ख़ुद को समझाते है कि जो हुआ अच्छा हुआ।
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हम हारे हुए लोग है, ऐसे लोग जो आसानी से साबित कर सकते है कि हमारी हार में हमारा कोई दोष नहीं था।
हार-जीत का क्या है वो तो चलती रहती है। एक सिक्के के दो पहलू है।
हाँ सिक्का वही, जिसे उछाल कर हम ज़िन्दगी के फ़ैसले लेते है कभी-कभी। और फिर उन्हें मानते नहीं है या तब तक उछालते है जब तक वही परिणाम ना आए,जो हम पहले से चाहते है।

हम लोग दोगले क़िस्म के बुरे इंसान है। सो नियति को भला-बुरा कहना हमारे हक़ में नहीं है। चलने दो जो हो रहा है। कहीं चलकर चाय पीते है इस बकवास में कुछ नहीं रखा।
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सुनों वो सिक्का खो गया है जिससे तुमनें  फैसला किया था उस दिन, अगर मिले तो लौटा देना। उसे सम्भाल कर रखूँगा।
-नितेश कुशवाह 'निशु'
8 मार्च 2018
दोपहर और शाम के बीच का वक़्त
【 5 मार्च 2016 की एक पोस्ट पर नज़र पड़ने के बाद लिखी गयी बकवास】

डिलीटेड यादें

**** दुनिया ख़त्म होने को थी, कई तरह की प्राकृतिक घटनाएँ  होने की ख़ास वजह  थी शायद ये कि मौजूद तमाम तरह के निशान मिट सके।हमेशा के लिए। फिर सद...