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Sunday, February 6, 2022

यादों का झरोखा

यादों का झरोखा..!!
नमस्कार! मेरी यादों के इस डिजिटल झरोखे में आपका स्वागत है।
 दैनिक दिनचर्या में जब कभी यादों की दराज से कुछ स्मृतियाँ बाहर निकलकर झाँकने लगती हैं, तो मैं भी कुछ देर उन्हें गले लगाकर पुरानी कोई बात कहने सुनने लगता हूँ। बस उन्हीं किस्सों के आस-पास कहीं यादों,बातों, कल्पनाओं को शब्दों में पिरोने की कोशिश ये ब्लॉग है। आपका साथ हमेशा से रहा है। उम्मीद है ये साथ बना रहेगा। शायद मेरी कोई याद आपकी भी किसी याद जैसा हो। इसी उम्मीद से जो कुछ भी लिखूँगा आप तक इस ब्लॉग के माध्यम से पहुँचता रहेगा।
बहुत धन्यवाद🙏

Friday, January 14, 2022

भावुकता : एक खतरनाक रोग

रेणु मैला आँचल में कहीं लिखते हैं कि 
"भावुकता का दौर भी एक खतरनाक रोग है"
मुझे याद है कि भावुकता वश मैंने जब भी कोई फ़ैसला किया है,किसी के सामने कोई बड़ी बात कहीं है उसका परिणाम ख़राब ही रहा है.
दूसरी मज़ेदार बात, मुझे लगता है कि भावुकता में आदमी कम से कम सच ही बोलता है (या जो उसे सच लगता है)
और ये बात तो सिद्ध ही है कि सच बोलने से आज के दौर में परिणाम ख़राब ही निकलता है.

      भावुकता यानी भावों के प्रवाह में कहीं गयी बात. जितनी ज़्यादा भावुकता उतना ही ज़्यादा  नो फिल्टरेशन. ये भी समझने योग्य है कि जो व्यक्ति जितना अधिक भावुक होता है , उसमें सच्चा होने के उतने प्रबल चांस हैं. भावुक व्यक्ति सच्चा, ईमानदार, संवेदनशील होता है, लेकिन तर्क, रिश्तों के जोड़-घटाव, फ़ायदे-नुकसान में उतना ही कच्चा. बहुत कमाल की बात यह भी है कि जो व्यक्ति पहले-पहल भावुक, संवेदनशील होता है, एक वक़्त के बाद वो प्रैक्टिकल हो जाता है.
आख़िरश सभी को अपने-अपने रोगों से बाहर निकलना चाहिए. सच भी है भावुकता रोग ही तो है,नुकसान पहुँचाने वाला ख़तरनाक रोग.
****
-नितेश
14 जनवरी 2022
7.22  pm

Monday, January 10, 2022

प्रार्थनाएं जो कभी ईश्वर ने नहीं सुनी

प्रार्थनाएं जो कभी ईश्वर ने नहीं सुनी..
एक ज़रूरी ई-मेल (जो शायद 3-4 दिन पहले आया हो) देखने के लिए मेलबॉक्स खोला.
तमाम तरह के ग़ैर-ज़रुरी मेल्स के बीच ज़रुरी मेल खोजना मुश्किल जान पड़ा. अचानक ज़ेहन में आया कि स्पैम (अवांछित फोल्डर) में देख लूँ. कुछ ही सेकण्ड्स में मिल गया.
              इसी प्रक्रिया में ख़याल आया कि वे ज़रुरी प्रार्थनाएँ जो कभी पूरी नहीं होती, क्या ईश्वर तक पहुँची होंगी कभी?
क्या ईश्वर भी कभी स्पैम में अनसुनी/ अवांछित प्रार्थनाएं खोजता होगा?
क्या हुआ होगा उन निवेदनों का, जो ईश्वर ने प्रथम दृष्टया देखकर "....बाद में सोचूँगा" जैसे जुमले से पेपरवेट के नीचे दबा दिए हो और भूल गया हो. 
कितनी प्रार्थनाएँ, कितने मन्नत के स्वास्तिक, धागे अपनी जगह पर प्रतीक्षा कर रहे हो कि एक दिन ईश्वर लोगों के भेजे हुए सभी प्रार्थनाओं, e mails ,मन्नतों को स्वीकार कर ले.
*****
१० जनवरी, २०२०. 
6.22 pm
(छायाचित्र - साभार  इंटरनेट)

डिलीटेड यादें

**** दुनिया ख़त्म होने को थी, कई तरह की प्राकृतिक घटनाएँ  होने की ख़ास वजह  थी शायद ये कि मौजूद तमाम तरह के निशान मिट सके।हमेशा के लिए। फिर सद...