नमस्कार! मेरी यादों के इस डिजिटल झरोखे में आपका स्वागत है। दैनिक दिनचर्या में जब कभी यादों की दराज से कुछ स्मृतियाँ बाहर निकलकर झाँकने लगती हैं, तो मैं भी कुछ देर उन्हें गले लगाकर पुरानी कोई बात कहने सुनने लगता हूँ। बस उन्हीं किस्सों के आस-पास कहीं यादों,बातों, कल्पनाओं को शब्दों में पिरोने की कोशिश ये ब्लॉग है। शायद मेरी कोई याद आपकी भी किसी याद जैसा हो।
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Monday, February 21, 2022
बूढ़ी कविताएँ
Sunday, February 6, 2022
यादों का झरोखा
Monday, January 31, 2022
मौन में रिश्तों की बात
Wednesday, January 19, 2022
चाय पीने इतना वक़्त
अगर मरने के बाद हम सोचते तो ये ज़रुर सोचते कि "काश मौत ऐसे यूँ अचानक से ना आ गयी होती।"
आ भी गई होती तो घड़ी भर का वक़्त देती साथ मे चाय पीने जितना। कहती कि कुछ पल हैं अभी तुम्हारे पास। रिलैक्स! चाय पीने इतनी देर रुका जा सकता है। काश कि मौत की प्रक्रिया में कुछ ऐसे पलों की रियायत होती, जिनमें अपनों को अलविदा कहा जा सकता। प्यार का चेहरा घड़ी भर याद कर लेते। उन लड़ाइयों के लिए माफ़ी मांग लेते मन ही मन, जिनके लिए ईगो के चलते सारी उम्र ख़ुद से मुँह बचाते रहे। उन किताबों को शुक्रिया कह पाते जिनके ना जाने कितने एहसान हैं।
उन लेखकों को मन ही मन कह पाते कि "हमारे मन एक जैसे हैं" जिन्होंने हमारे मन की बात तब कह दी जब हम उस बात को कहने के लिए शब्दकोश के पन्ने पलट रहे थे।
गुनगुना लेते कोई पसंदीदा शे'र।
यक़ीन दिला पाते किसीको कि हम उसे पाना नहीं चाहते थे बस कि पल भर उसके साथ होना चाहते भर थे। या उसके साथ होकर उसे छूकर देखना भर चाहते थे। कि ख़ुद को दिला सके यक़ीन कि वो है सचमुच, इस जहाँ में है। कल्पना भर नहीं है। सचमुच है।
कितना कुछ किया जा सकते है बस चंद पल में। लगता है मैं जितना सोच चुका हूँ उतना कुछ। और फिर ये पल ख़त्म हो जाते। मौत ने अपनी चाय की प्याली ख़ाली कर दी होती।
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नितेश
18.01.2022
Friday, January 14, 2022
भावुकता : एक खतरनाक रोग
Tuesday, January 11, 2022
बोझ से मुक्त
Monday, January 10, 2022
प्रार्थनाएं जो कभी ईश्वर ने नहीं सुनी
इंतज़ार
इंतज़ार.......इंतज़ार शीर्षक इसलिए कि अभी कोई ठीक ठाक शीर्षक सूझ नहीं रहा. वैसे भी सब कुछ ठीक ठाक से ज़्यादा कुछ है भी नहीं, कहीं पर भी नहीं।
वक़्त रेत की तरह मुठ्ठी से फिसलता जाता है, उम्मीदें ताश के पत्तों के महल की तरह बिखरती रहती है, बार-बार...लगातार।
बना रहेगा इंतज़ार, जैसे अब तक था।
हाँ उम्मीद नहीं रहेगी अब के एक दिन अचानक से कोई, कभी नहीं जाने के लिए लौट आए और दिन पलट जाए।
जितना जिसके हिस्से का इंतज़ार था , उतना उसका किया जा चुका।
ताश के पत्तों के महल की मानिंद ख़्वाईशे हैं.
अब फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता किसी चीज़ का ये सोचता हूँ तो लगता है शायद यही ढूंढ रहा था ख़ुद में.
सोचता हूँ कभी फ़र्क पड़ता था ब्लॉक होने से,
किसी के फ़ोन ना उठाने से. अब एक ऊब होती है किसी से बात करने में, किसी से नहीं सब से.
कुछ एक दोस्त हैं जिनसे तबियत मिलती है .
एक है जो बिल्कुल अपने जैसा लगता है, उससे ना रश्क़ होता है ना ऊब. लगता है ख़ुद के हिस्से से बात करना.
एक सिरीज़ आयी थी समानांतर. वैसा ही कुछ.
ज़िन्दगी ठीक चल रही है कुल जोड़ घटाकर.
अब वैसी दीवानगी नहीं होती किसी के लिए, ख़ुद के लिए होता है सबकुछ.
पर ठीक ठीक अब भी नहीं पता कि क्या ढूंढ रहा हूँ. कभी जिसके लिए जीवन का सबकुछ लुटाया जा सकता था अब कुछ ख़ास फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता.
क्यूँ इतनी पसन्द बदल गयी हर एक चीज़ में.
वैसे तुम्हें बताना बस यह था कि अब सफ़ेद पसन्द नहीं उतना, अब नीला रंग सबसे ज़्यादा पसंद है। मुझे ख़ुद तक पहुँचाने का शुक्रिया।
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१० जनवरी, 2022
सुबह के ४ बजे
(तस्वीर : साभार internet )
Tuesday, July 2, 2019
बारिश
ब से बारिश....
शाम के वक़्त अक्सर बारिश भी प्रेम करने वालों पर मेहरबान हो जाती है..थोड़ी-बहुत नहीं घनघोर बारिश..!!!
मैं कभी-कभी ऐसी बारिशों में उसे स्टॉप तक छाता लेकर लेने जाया करता था। वैसे स्टॉप और मेरे फ़्लैट की दूरी महज़ 500 मीटर की रही होगी, जिस तक पहुँचने में कुछ 5-6 मिनट का वक़्त लगता था। बारिश के दिनों में पूरी कॉलोनीज़ के रोड़ पर पानी घुटनों तक भरा होने के कारण ये वक़्त बढ़कर 10-12 मिनट हो जाया करता था। जब भी ऐसे वक़्त उसे लेने जाना हो वक़्त फिर सिमटकर 5-6 मिनट हो जाया करता था।
शायद वो कभी भीग भी जाती तो दुनिया का इतना नुकसान नहीं होता,
लेकिन उसके भीगने की वजह से हम दोनों एक साथ बीमार नहीं होना चाहते थे।
शुरुआती एक-दो कॉल के बाद मैं उसके बिन बुलाये ही छाता लेकर उसे लेने पहुँचने लगा। यहीं जुलाई की शामें थी।
एक ऐसी शाम थी। जब बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। अचानक मुझे याद आया कि उसके ऑफ़िस से आने का वक़्त हो गया है। मैं नींद से उठा छाता लेकर निकल पड़ा। जहाँ आम तौर पर बारिश में उसके लिए मैं ये दूरी 5-6 मिनट में तय कर आज 2 से 3 मिनट ही लगे थे। पता नहीं कैसे पर शायद प्यार सचमुच दूरी, समय सब कम कर देता है। आपको एहसास भी नहीं होता कि आप कितना सफ़र तय कर चुके हैं।
मैं स्टॉप पर खड़ा रहा।वो नहीं आई।मैं बार-बार टाइम देख रहा था..10 मिनट.....15 मिनट..20 मिनट...30 मिनट.. हो सकता है आज लेट हो गयी हो और मेरे दिमाग मैं ये ख़याल भी नहीं आया कि एक फ़ोन कर लूँ, ये तो एक बहुत आम-सी बात थी,पर पता नहीं क्यों मैंने नहीं सोचा।
40 मिनट...42 मिनट..45 मिनट।
अब मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। वो नहीं आई, आती भी कैसे।
46 मिनट.. 47 वें मिनट मुझे अचानक जब कुछ याद आया, दिमाग़ ने काम करना शुरू किया, तब मेरे पैरों से ज़मीन खिसक गई।
क्या? तो क्या ये दो साल पहले की बात है जब मैं उसे यहाँ लेने आया करता था। उसे शहर छोड़े हुए 17 महीने हो गए हैं और मैं उसका इंतज़ार इस स्टॉप पर कर रहा था।
प्यार में सचमुच वक़्त का पता नहीं चलता। अब भी वो मुझसे बहुत दूर किसी शहर में है, पर लगता है यहीं तो है।
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न से नितेश
#दुलप्रेक (दुःखभरी लघु प्रेम कथा)
Sunday, November 25, 2018
तुम्हारे बिना स्वर्ग का क्या करेंगे..
आसपास पटाकों की आवाज़ थी,शोर नहीं था,,ख़ुशियाँ थी!! शहर से गांव तक का पूरा रास्ता सजाया हुआ था। गाँव में उत्सव था। लोग एक-दूसरे को मिठाइयाँ बाँट रहे थे।
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कुछ दिन पहले हम एक कॉफ़ी शॉप जैसे किसी रेस्तरां में बैठे थे। मैं बहुत कुछ कहना चाह रहा था पर लफ़्ज़ साथ नहीं दे रहे थे।
मेरे बोलने से पहले ही..
तुम- ''मैं तुम्हें इस हाल में नहीं देख सकती,तुम्हारे दुःख की वज्ह नहीं बन सकती उम्र भर!!''
मैं- ''ह्म्म्म्म तो..?''
तुम- ''चलो चलकर शादी कर लेते हैं!!''
अगले कुछ घण्टों में हम एक फूलों की दुकान के सामने थे। जो सड़क के उस पार थी।
मैं कुछ गुलाब और फूल मालाएँ लेकर तुम्हारी और बढ़ रहा था! तुम्हें देखकर मुस्कुराते हुए।
अचानक....
एक गाड़ी ने मुझे जोरदार टक्कर मार दी..
अगले कुछ घण्टे बाद..
आसपास बहुत से लोग..डॉक्टर्स, नर्स, रिश्तेदार,दोस्त और तुम...
मुझे लेटाकर जल्दी से वेंटिलेटर पर रखा जा रहा था.... शोर में बस ये सुनाई दे रहा था कि मेरी हालत बहुत नाज़ुक है! बचने की संभावनाएं नगण्य!मैं कोमा में था।
अगले तीन दिन हॉस्पिटल टाइप के मनहूस माहौल में तीन साल जैसे गुज़रते रहे।
चौथे दिन मैंने हरकत करना शुरू की..फिर से भीड़।
तुम मेरे सामने थी।
(मैं सबकुछ भूल चूका हूँ हादसे के दिन के बाद का। और जो याद है तबसे अब तक का वो ये कि..)
मैं- तुम यहाँ हो, मुझे कोई मिला था जो भगवान होने का दावा कर रहा था।
(सभी मेरी तरफ आश्चर्य और ख़ुशी से देख रहे थे, मैं बस बोलता जा रहा था, क्या? पता नहीं)
मुझे एक बहुत बड़े वेटिंग रूम में बिठाया गया, फिर सफ़ेद कपड़े पहने कोई आया, जिसने कहा कि तुम्हारे भगवान तुम्हे अंदर बुला रहे हैं, मैं अंदर गया ये सोचकर कि ज़रूर तुम कोई नाटक कर रही हो, या मुझे कोई surprice देने वाली हो। वहाँ गया तो वहाँ एक बहुत तेज़ आभामण्डल के कोई सिद्धपुरुष बैठे थे, लग रहा था मानों हज़ारों सालो से किसी तपस्या में लीन हो।)
वो- हम भगवान हैं, ईश्वर!
मैं -नहीं वो तो अभी मेरे साथ थी, मैं जिससे प्रेम करता हूँ! जिससे मैं शादी करने जा रहा था और तुमने अचानक मुझे यहाँ बुला लिया, अब जल्दी बोलो मेरे पास ज़ियादः वक़्त नहीं है। मेरी शादी होने वाली है! मेरी प्रेमिका मुझे खोज रही होगी।
वो- बच्चे! मैं जानता हूँ तुम मुझसे ज़ियादा मानते हो उसे, पर उसकी फ़िक्र मत करो। तुम मर चुके हो अब।
मैं- ये कहाँ का न्याय है, तुम्हारी बेरंग दुनिया में मैंने बस एक रंग माँगा था, तुमने वो भी छीन लिया,, तुम ईश्वर नहींहो सकते। हो ही नहीं सकते!! शैतान हो तुम। जाओ अपनी दुनिया में जाकर देखो। किसी को प्रेम करके देखो। असल तपस्या है प्रेम। प्रेमी होने का
दुःख देखों, तब स्वयम् को ईश्वर कहना। तुम शैतान से भी निर्दयी हो।
वो- तुम्हे अगले जनम में वही मिलेगी, तुम्हारा इंतज़ार करते हुए। अब जाओ आगे स्वर्ग का दरवाज़ा है।
मैं- नहीं चाहिए ये तुम्हारा बेकार स्वर्ग, जहाँ मेरी प्रियसी है वही मेरा स्वर्ग है।
(दो दरबान मुझे पकड़े हुए एक दरवाज़े की तरफ ले गए, और मुझे धकेल दिया)
फिर से हॉस्पिटल...
मैं - बस मुझे इतना ही याद है!!
सब रोने लगे और मुझे गले लगाने के लिए बढ़े। हम शहर के हॉस्पिटल से घर की और निकल पड़े और ये सफ़र ज़िन्दगी का था। बाकि सब कहानियाँ....!!
तो बस यही था,, कल रात जो ख़्वाब देखा था!!
कल रात एक ख़्वाब देखा था।
-न से नितेश🙂
डिलीटेड यादें
**** दुनिया ख़त्म होने को थी, कई तरह की प्राकृतिक घटनाएँ होने की ख़ास वजह थी शायद ये कि मौजूद तमाम तरह के निशान मिट सके।हमेशा के लिए। फिर सद...
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आसपास पटाकों की आवाज़ थी,शोर नहीं था,,ख़ुशियाँ थी!! शहर से गांव तक का पूरा रास्ता सजाया हुआ था। गाँव में उत्सव था। लोग एक-दूसरे को मिठाइयाँ ब...
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ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो रास आने लगे हम को तो ये दुनिया ही न हो टकटकी बाँध के मैं देख रहा हूँ जिस को ये भी हो सकता है...