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Friday, December 12, 2025

डिलीटेड यादें

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दुनिया ख़त्म होने को थी, कई तरह की प्राकृतिक घटनाएँ  होने की ख़ास वजह  थी शायद ये कि मौजूद तमाम तरह के निशान मिट सके।हमेशा के लिए। फिर सदियों बाद नईदुनिया भी यहीं बसनी थी। सिलसिला हज़ारों सालों से चल रहा था।  धरती चीख़ रही थी, प्रकृति का कहर बरपा था। उसने लगभग वो सारी निशानियाँ मिटा दी जिनसे ख़ूबसूरती थी।

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पुराने कुछ रिश्ते दम तोड़ चुके थे, कुछ वेंटिलेटर पर आख़री साँसे ले रहे थे।  फ़ोन कई तस्वीरों से भरा था । एक फ़ोल्डर जो जुलाई 2017 का था उस तक पहुँचने में चन्द मिनट लगते जबकि वापसी में महीनों। वैसे इसे दो बार डिलीट भी किया गया था पर जाने क्यू फिर रिकवरी के लिए तेज़ बारिश में बिना छाता लिए दौड़ते रहे थे।  इस बार मन और मजबूत करके दिल पर 100 kg बोझ रखकर फोल्डर में एक-एक कर तस्वीरें हटानी शुरू की। हर तस्वीर की कोई कहानी होती, जो खींचे गए पलों और बातों की याद दिलाती। उससे कहा भी था कि इतनी तस्वीरों का क्या करेंगे हम!! वो कहती ''तस्वीरें यादें बनाती हैं..हम ज़ियादा दिन साथ नहीं रहेंगे..पर ये तस्वीरें साथ रखना । ये तुम्हें मेरी याद दिलाएगी।'' मैं कहता- ''कही नहीं जा रही हो तुम,अभी तो आई हो..'' '' तुम इतनी फ़िक़्र मत किया करो यार..मुझे डर लगने लगता है तुमसे..'' ''अरे.....''  दोनों चुप हो जाते, अगले ही पल वो कहती ''लाओ फ़ोन दो..सेल्फ़ी लेनी है'' मैं देखता हूँ कि इक तस्वीर जिसमें वो मेरे साथ बहुत नज़दीक खड़ी है, उसने बाँहों में आने से कम और कंधे पर हाथ रखने से कुछ ज़ियादा होकर वो तस्वीर ली है..!! डिलीट करते हुए उस तस्वीर के पहले की बातें याद आई। वो दिन सबसे बुरा और सबसे अच्छा था ज़िन्दगी का। डिलीट करने में लगा वक़्त था 8 मिनट 40 सेकंड।  अगली तस्वीर एक ग्रुप फ़ोटो थी जिसमें कई सारे दोस्त थे, वो मेरे कंधे पर सर रखकर और बाहें डालकर पोज़ दे रही थी। हम दोनों मुस्कुरा रहे थे । उसने तस्वीर के दौरान कहा '' मैं ज़िन्दगी भर तुम्हारे साथ ऐसे ही बैठी रहूँ तो कितना अच्छा हो'' ''आर यू क्रेज़ी? बाकि काम कौन करेगा मैडम..'' वो 10 जुलाई की शाम पता नहीं था कि ज़िन्दगी की आख़री खूबसूरत शाम होगी। ख़ैर वो तस्वीर भी डिलीट कर दी गयी । इस बार वक़्त कुछ ज़ियादा लगा लगभग 21 मिनट कुछ सेकंड।   अब वक़्त बदला है हम दोनों ही अब किसी और के साथ ज़ियादा तस्वीरें नहीं लेते। यानी बाद बिछड़ने के इतना दर्द नहीं होगा ।  अब समझ आता है कि किन बातों से तकलीफ़ होती है, वो मोमेंट जीना छोड़ देते हैं अब ।  कल यूट्यूब पर एक वीडियो देखने से पहले ऐड आया,मैंने 4 सेकंड के बाद उसे skip कर दिया।हमारी ज़िन्दगी में स्किप करने का ऑप्शन होता तो कितना अच्छा होता ना सब कुछ? हम जिस लम्हें को याद नहीं करना चाहते उसे स्किप कर देते। जब चाहे ज़िन्दगी में save यादें डिलीट कर देते ।  पर इतना आसान थोड़े ही होता है। ख़ैर मूव ओन करों जानी.. फ़ोन के साथ दिल का भी स्टोरेज कम करो कि अब इनमें नई फ़ोटोस रखनी है।

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लोग  क्यों किसी को इतने पास आने देते हैं? क्यों ख़ुद को रोक नहीं पाते? क्या वजह रहती होगी प्रेम में पड़ने की? मैं कभी-कभी इन लोगों से मिलकर सोचने लगता हूँ कि मुझे कभी किसी से प्रेम क्यों नहीं हुआ? किताबों के बाहर की दुनिया में मेरे जैसे लोग बसर क्यों नहीं कर पाते?  

✒न से नितेश

(कहानी पहली बार 12 दिसम्बर 2018 को फेसबुक पर पोस्ट की थी)

Monday, April 11, 2022

ना अपने बारें में ना तुम्हारे.. दुनिया के किसी हिस्से की बात!

ये भी मुमकिन है कि आँखें हों तमाशा ही न हो 
रास आने लगे हम को तो ये दुनिया ही न हो 
 
टकटकी बाँध के मैं देख रहा हूँ जिस को 
ये भी हो सकता है वो सामने बैठा ही न हो
(ज़फ़र इक़बाल)

दुनिया के बारें में कभी ठीक-ठीक समझ नहीं पाया। कभी लगता है दुनिया मेरे जैसों के लिए नहीं है। कभी लगता है कि दुनिया का मतलब मेरे लिए तुम्हारा होना है जैसे, और कुछ नहीं। कभी किसी दिन यूँ ही अगर मन लग गया दुनिया में तो लगने लगता है कहीं सब कुछ ख़त्म ना हो जाए अगले ही पल। कहीं अगले ही पल दुनिया ख़त्म ना हो जाए। जैसे अचानक से कोई आपदा ना आ जाए या कोई विश्वयुद्ध जिसमें दुनिया ख़त्म ही हो जाए।

मेरे लिए दुनिया यानी तुम। तुम्हें सामने बैठकर देखते रहना, दुनिया का ऑब्जरवेशन करते रहना। सिर्फ़ ऑब्सर्वसशन आलोचना नहीं।
तुम्हारा रोज़ रात गए मेरे सामने आ कर बैठे रहना। हालाँकि कोई इसका यक़ीन नहीं कर सकता कि तुम रोज़ मेरे सामने होती हो या मैं तुम्हें वैसे महसूस करता हूँ जबकि तुम हो नहीं यहाँ। पर अच्छा लगता है तुम्हें यूँ महसूस करना। 
अब कहानी लिख नहीं पाता पता नहीं क्यूँ। शायद कहानियों के यथार्थ अंत,दुखद अंत से डरता हूँ। इन दिनों मेरा एक क़रीबी मित्र ख़ूब कहानियां लिखता है या ठीक ठीक कहानी नहीं कुछ कुछ क़िस्से जैसा। पर मैं नहीं लिख पाता। शायद तुम गयी तो मेरा शब्दकोश रिक्त हो गया। जैसे तुम्हारे सामने होने से मैं निशब्द हो जाता रहा हूँ हमेशा से। सिर्फ उन दोपहरों के अलावा जब तुम ख़ूब बातें करती थी और मैं कुछ कुछ बोल पड़ता था या कि तुम्हारी वो बातें जो तुम बीच मे छोड़ देती थी उन्हें आगे बताने का आग्रह करता रहता था। फिर एक दिन मैंने तुम्हें पूरी तरह जान लिया। उसी दिन से तुम फिर से मेरे लिए अजनबी हो गयी थी। 
सोचता हूँ तुम्हें ख़त लिखूँ उसमें ये सब लिखूँ जो तुम्हारे आगे नहीं कह पाता। सोचता हूँ कि तुम्हें भेज दूँ कोई पसंदीदा किताब जिसपर मैंने जगह जगह अंडरलाइन कर रखा हूँ उन वाक्यों को जिन्हें मैं तुम्हें हमेशा कहने से डरता रहा हूँ। कई बार चाहा था कि विदा करते हुए तुम्हें गले लगा कर रो पडूँ। पर ये नहीं कर पाया कभी। शायद तुमसे हाथ भी ना मिला पाया। पर तुमने भी तो पलट कर नहीं देखा कभी एक बार भी नहीं। जबकि हमेशा रहा इतना अवकाश कि तुम देखती पलटकर या मैं तुम्हें गले लगाकर विदा करता। सोचता हूँ कि मेरा लिखा जब तुम तक पहुँचता है तो तुम्हारे चेहरे पर क्या भाव आते होंगे,  तुम्हारे मन में भी उठता होगा कोई उबाल?
कितना कुछ है जो सिर्फ़ तुम ही कह सकती हो।कितना कुछ। कितना मुश्किल रहा होगा मेरे लिए ख़ुद को कन्विंस करना, शायद कभी सोचा नहीं होगा तुमने। तुम्हें अवकाश नहीं मिला होगा सोचने का या कि तुम आगे निकल चुकी हो इतना जहाँ से मुड़कर कुछ दिखाई ना देता होगा। कितनी बातें लिखी जा सकती है ख़त में ?.. सोचता हूँ। कितना छोटा सा रास्ता है तुम्हारे घर से मेरे घर तक आने का, मगर कितना वक़्त लगता है ना छोटा सा रास्ता पार करने में। 
डरता भी हूँ कि तुमने जो रास्ता चुना है कहीं ग़लत ना निकल जाए। पर भरोसा भी है एक जो कहता है तुम मैनेज कर लोगी। क्या वो सारे लोग अब भी मिलते हैं जो पहले मिलते थे? मुझे मिल जाते हैं सरे राह। कुछ कहते नहीं बस मुस्कुराते हुए गुज़र जाते हैं, जवाब में मैं भी एक फीकी मुस्कान दे देता हूँ। 
सोचता हूँ मुस्कुराना दुनिया का सबसे मुश्किल काम है। ख़ैर तुम तो ख़ुश हो तो मैं भी ठीक ठाक। आँखों में जलन होती थी और सरदर्द भी। चेक अप कराया था सब ठीक है बस स्क्रीन ग्लासेस का कह दिया था डॉक्टर ने।  आजकल चश्मा लगाते हैं लैपटॉप पर काम करते वक़्त और चाय बिल्कुल कम कर दी है। 
तुम्हारा फ़ैसला सही हो। दुआ है।

मैं रस्मन कह रहा ठीक हूँ मैं
वगरना ठीक जैसा कुछ नहीं है......
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नितेश
30 अप्रैल 2022 के आसपास शायद!

Thursday, March 24, 2022

एंजायटी के दिनों के नोट्स - १

कोई ग़ज़लें सुनाएगा तो मेरी याद आएगी..सुनोगी जब कोई नगमा  तो मेरी याद आएगी.
के जब आएगी मेरी याद तो सोने नहीं देगी, अपनी बाँहों के तकिये से भी मेरी याद आएगी.
                                                                                ******
तुम नहीं थी तब जब तुम्हारी सबसे ज़्यादा ज़रुरत थी. जब इंतज़ार था तब नहीं आयी तुम।
 बुरे दिनों की बुरी बात - ये नहीं थी कि दिन बुरे हैं- क्या थी जानती हो?
बुरे दिनों की बुरी बात ये थी कि साथ देने के लिए तुम नहीं थी। मौजूद ही नहीं बल्कि मन से भी नहीं। 
अच्छा हुआ बुरे दिन बीत गए.. वक़्त के साथ अच्छा ये भी होता रहा कि तुम्हारी आदत भी कम हो गयी और मैंने अकेले अच्छे वक़्त तक आने का अपना सफ़र पूरा किया।
ठीक हुआ कि इस अच्छे दिनों तक आने के सफ़र में तुम साथ नहीं रही, नहीं तो मुझे उम्र भर लगता कि मैं तुम्हारे कारण नई सुबह देख पाया। 
जो होता है अच्छे के लिए होता है।
                                                                                 ******
मन रमता जोगी है. दुनिया भर की बातें सोचता है  पर दुनिया के छल कपट में ठगा ही जाता है। जब कभी चालक बनने की कोशिश की, दोस्तों ने परायेपन से पूरा नाम लेकर कहा (अपनेपन में बस निशु बुलाते हैं ) ,
“नितेश कुशवाह तुम ज्यादा बनने लगे हो “
फिर से जब पहले जैसा रहने लगा तो सबने कहा कि बचपना छोड़ो भी, बड़े हो जाओ.
परिणाम ये हुआ कि मन में  उठने वाली बातें मन में दबने लगी.
समय के साथ बचपना छूटा भी. कई कई बातें होती जिनके बारें में लगता कि किसी करीबी दोस्त को बताएँ, पर फिर मन नहीं किया. कि उन बातों के वाक्य-विन्यास भी ना थे ठीक से. अब ऐसी बातें कैसे बताई जाये. और कोई क्या सोचेगा अजीब बातों को सुनकर.

एक वक़्त पर दिमाग में अजीब अजीब कई कई बातें एक साथ चलने लगी/ या उठने लगी . 
शायद उठने ही लगी होगी.. खैर ठीक ठीक मेरी लेखनी की पकड़ में नहीं आता. 
वो भाव महसूस किया जा सकता है बार बार, पर एक बार ठीक से लिखा नहीं जा सकता.बिल्कुल ऐसे जैसे कई चीटियाँ चल रही हो दिमाग में. 
 
                                                                             ******
जिन दिनों तुमसे बात नहीं होती थी, दुनिया जैसे काटने को दौड़ती थी. बात होने के दिनों में भी मैं कुछ ख़ास बात करता नहीं था. किसी से फोन पर बात करने का शऊर मुझे आज तक ना आया. बातें मैंने भी ख़ूब की पर जैसे नीरस सबकुछ.
 ह्म्म्म…हाँ….अच्छा..ठीक..क्यूँ… इससे आगे मुझे कुछ सुझा ही नहीं कभी..मेरी एक दोस्त थी.उससे जब भी बात होती. बात शुरू होने के 1 मिनट बाद हम एकदूसरे से कहने लगते कि कोई टॉपिक निकालो. ऐसे करके 1 मिनट बात और होती.फिर दोनों तरफ से बाय बोल दिया जाता. हाँ पर बात करते रहने से एक निबाह बना रहता या सब ठीक चल रहा हो ऐसा अंदेसा बना रहता. बात चाहे १० मिनट ही हो पर होनी चाहिए. इन दिनों जो उससे बात होती भी तो वैसी नहीं हैं. वो अनौपचारिकता बातों में नहीं है, जिनसे सब ठीक चलने का अंदेसा हो. बार बार मन की गांठ पड़ने से भी मन के रिश्ते वैसे नहीं रहते. फिर सब कुछ ठीक किया भी जा सकता है. पर मुझे शायद कुछ ठीक करने से ज़्यादा सुख उसकी बातें करने में ( यहाँ  लिखने में पढ़ा जाये ) आता है.
                      हाँ अब भी बातें तुमसे नहीं होती, अब भी दुनिया काटने को दौड़ती हो पर अब चमड़ी मजबूत हो गयी है. कि फ़र्क पड़ता नहीं अब कुछ भी.. हाँ बताना ये भी था कि अब भी अपनी पसंद की ही कॉलर ट्यून है.
                                                                             ******
          
                पता नहीं याद के इस टुकड़े को यहाँ रखना ठीक है या नहीं. क्यूँकी इसका कोई भी सिरा  एन्जआयटी से नहीं जुड़ा है. ये जुड़ा है अलगाव  से, बिछड़ने से नहीं, बिछड़ना एक बड़ा भारी शब्द है जो अपने इस्तमाल के साथ बड़ा भारी  दुःख लेकर आता है.. इसलिए कहा कि ये अलगाव से जुड़ा है.. तो उससे अलग होने के बाद ऐसा कोई ख़ास दुःख नहीं आया जो किसी के बिछड़ने से आता है. जैसे हफ्तों भूख ना लगना, प्यास की सुध बुध ना रहना. किसी काम में मन ना लगना. मौसम की जानकारी ना रहना,ये सब सामान्य चीज़े बराबर चलती रही. नियत वक़्त पर, जिंदगी चलती रही वैसी ही जैसी चल रही थी. फ़र्क आया था वक़्त के उस हिस्से में जो उसके नाम रहा करता था.. वो  थोड़ा सा समय का टुकड़ा जैसे उस पर फफूंद उग आई थी या जैसे सीलन लग जाने पर कमरे की दीवार बार बार ध्यान खींचती है अपनी दीन दुर्दशा पर वैसे दशा में आ गया था . उस समय के खालीपन में एक स्थिरता थी, एक ऊब और एक बहुत खिंचापन था.
सोचता हूँ वो क्या था, जो अब तक भी बराबर बना हुआ है.किसी के जाने से सारा सब ठीक हो जाता है या प्रिय ना हो, मन  से उतर गया हो तो भुलाया  जा सकता है लेकिन वो जो वक़्त होता है किसी हिस्से का उसका एक अरसे तक ठीक ठीक ठिकाना नहीं लगता.. 
हम लोग उस समय का उपयोग किसी ऐसी जगह जरुर कर सकते हैं जिसमें दिमाग से ख़ूब ख़ूब काम लिया जा सके. बाकि एक दिन ये भी ठीक हो ही जाएगा. ऐसी उम्मीद तो कर ही सकते हैं. हैं ना ?   

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नितेश 
19-3-2022

Thursday, March 10, 2022

स्व से पलायन: एक आत्ममंथन

घर में रहते हुए यूँ तो लगता था कि अपनो के  आस-पास हैं, पर अपने आप से दूर होकर कैसा लगता है ये सिर्फ मुझे घर ही ठीक-ठाक तरह से महसूस होता था। मैं घर में तीसेक दिन रहता तो मुझे जैसे घर काटने को दौड़ता था। मेरा बचपन से ही कहीं भाग जाने का मन करता था, पर मैं कभी ज़्यादा दिन तक के लिए कहीं भाग नहीं पाया।

भाग कर जाना कहाँ ? शायद ये सवाल मैं कभी हल नहीं कर पाया।

दरअसल मैं अपने आप से भागना चाहता रहा हूँ।वये मुझे बिल्कुल ठीक तरह से तब पता चला जब मैंने अज्ञेय से सम्बन्धित या अज्ञेय का लिखा हुआ “स्व से पलायन ...” जैसा कुछ पढ़ा। कई दिनों तक मैं उसके आकर्षण में रहा।

फिर एकाएक एक दिन मुझ पर खुला कि यही तो मैं चाहता था/हूँ।  स्व से पलायन....ख़ुद से भागना..

मैं ख़ुद से भाग जाना चाहता था.ख़ुद का मतलब जो मैंने अब तक जीया। मैं वर्तमान में तो रहना चाहता था , मगर ऐसा वर्तमान जहाँ भूत ना हो, बिल्कुल भी नहीं।

सबके अपने-अपने पिंजरे होते हैं, पर सब आज़ाद होना नहीं चाहते।

मेरे लिए मेरा पिंजरा मेरा अतीत था या हमेशा से रहा है।मैं अतीत से भागना भी इसलिए चाहता रहा हूँ कि मुझे वो सब ग़लतियाँ नहीं करनी थी जो मैंने की। जिसका एक बड़ा परिणाम मैंने भोगा। पर इतनी सारी गलतियाँ सुधारना मुश्किल होता, उससे आसान होता सारे अतीत को मिटा देना।

 स्व से पलायन मतलब  क्या? ये ठीक-ठीक मेरे लेखन की पकड़ में नहीं आता। लेकिन मैं ख़ुद को अपने से बाहर महसूस करना कैसा होता है. बिल्कुल वैसा महसूस करना चाहता हूँ। एक-दो बार शायद मैंने महसूस किया भी है।वैसे ही मैं ख़ुद से भाग जाना चाहता हूँ। मैं देखना चाहता हूँ ख़ुद को सामने वाले पेड़ की डाली पर बैठी चिड़िया जैसे मुझको देख रही है उस निगाह से।

 अक्सर मैं जब बैठता हूँ कहीं चाय की टपरी पर तो वहाँ से जाते हुए 2-3 बार मुड़कर देखता हूँ कि कुछ छूट तो नहीं गया। दरअसल मैं ख़ुद को कहीं थोड़ा-सा छोड़ आता हूँ या भूल आता हूँ शायद। मेरे जिस छूटे हुए हिस्से को मैं पलटकर देखता हूँ 2-3 बार, वो दिखाई नहीं देता, शायद उड़ जाता है हवा में या ब्रम्हांड में चले जाता हो पता नहीं। लेकिन कुछ तो छूटता ज़रुर है।

कभी-कभी चलते चलते मैंने महसूस किया है कि मैं रेत की तरह कुछ-कुछ रिसता जा रहा हूँ। ठीक-ठीक रेत की तरह भी नहीं थोड़ी कम गति से, लेकिन रिसता जाता हूँ।

शायद ये मेरा अतीत ही हो जो जगह-जगह मुझसे कहीं छूट जाता है, जो रिसता जाता है। असल में हम जैसे लोग अभावों में जिए हुए लोग हैं। जो कुछ हमने ख़राब भोगा उसे हम छोड़ देना चाहते हैं। कहीं किसी गहरी खाई में फेंक देना चाहते हैं। हम हमारे हिस्से की खुशियों पर ज़्यादा दिन ख़ुश नहीं रह पाते।हम दुखो को ढोने के इतने आदि हो चुके हैं कि अगर थोड़े-थोड़े अवकाश के बाद पीड़ा ना नज़र आये तो हम उसके कारण खोजने लगते हैं।

हम अपने अभावों से भाग जाना जाता हैं, अपने अतीत से भाग जाना चाहते हैं, हम भूत से भागना चाहते हैं, वर्तमान में हो रही घटनाओं के प्रति उदासीन रहकर हम वर्तमान, भविष्य सब से भाग जाना चाहते हैं। हम थके हुए लोग हैं। पर एक दिन हम भाग कर लौट आएंगे वो जो लोग भटकते हुए नाकाम हो जाते हैं और घर लौट आते हैं उनकी तरह। अभी आवारागर्दी भली लग रही है। भागने में आनंद है।

-नितेश 

१० मार्च २०२२



           


Monday, February 21, 2022

बूढ़ी कविताएँ


बहुत कच्ची उम्र में लिखी गयी कविताएँ एक दिन सीधे बूढ़ी हो जाते हैं। वे जवान नहीं होती। एकाएक बाल पककर सफेद हो जाते हैं उनके।
और वो माँगने लगती हैं जवाब कि क्यूँ नहीं आये उनके जवानी के दिन। वो होती रहती हैं शर्मिंदा, तरतीब से कहीं गयी ग़ज़लों और कविताओं के बीच। उन्हें पटक दिया जाता है पुराने से कभी ना इस्तेमाल करने वाले नोटपैड में या ज़्यादा से ज़्यादा उस डायरी को रख दिया जाता है उस कोने में जहाँ से कौन उन्हें आसानी से ढूंढ ना पाए। उन कविताओं पर जमती रहती है धूल, लाइब्रेरी के उस वृद्धाश्रम में। उन्हें बार बार बेइज्जत किया जाता है कि तुममें व्याकरण दोष हैं, मात्राओं की अशुद्धियां हैं। जबकि उनमें होते हैं अपार अनुभव- अपार भावनाएं। 
हा.. हा.. हा...
बूढ़ों की भावनाओं की कद्र कौन करता है
पुरानी कविताएँ की कद्र कौन करता है।
-नितेश

Sunday, February 6, 2022

यादों का झरोखा

यादों का झरोखा..!!
नमस्कार! मेरी यादों के इस डिजिटल झरोखे में आपका स्वागत है।
 दैनिक दिनचर्या में जब कभी यादों की दराज से कुछ स्मृतियाँ बाहर निकलकर झाँकने लगती हैं, तो मैं भी कुछ देर उन्हें गले लगाकर पुरानी कोई बात कहने सुनने लगता हूँ। बस उन्हीं किस्सों के आस-पास कहीं यादों,बातों, कल्पनाओं को शब्दों में पिरोने की कोशिश ये ब्लॉग है। आपका साथ हमेशा से रहा है। उम्मीद है ये साथ बना रहेगा। शायद मेरी कोई याद आपकी भी किसी याद जैसा हो। इसी उम्मीद से जो कुछ भी लिखूँगा आप तक इस ब्लॉग के माध्यम से पहुँचता रहेगा।
बहुत धन्यवाद🙏

Monday, January 31, 2022

मौन में रिश्तों की बात


किसी बहुत क़रीबी से मतभेद होना कोई बहुत बड़ा विषय नहीं है.
मतभेद बड़ी आसानी से दूर किए जा सकते हैं, बस इस आसानी में जो मुश्किल आती है वो ज़िद और ईगो की है.और चीज़ें हमेशा से ख़राब नहीं होती, एक पड़ाव आता है वही आगे का फ़ैसला करता है.
बाकि तो समय है निकल जाता है और जो होता है अच्छे के लिए ही होता है.

एक छोटी सी यात्रा में हूँ. बस में एक गीत चल रहा है. गीत में पंक्तियाँ आती है-
"अगले जनम विच अल्लाह ऐसा खेल रचा के भेज़े
मैनू तू बना के भेज़े,तैनू मैं बना के भेज़े
वे फ़ेर तैनू पता लगना."
 काश ऐसी ही परिस्थितियों में अगले जन्म में हो और तू मेरी जगह हो तब शायद  तुझे एहसास हो कि मेरे दुख क्या है. मैंने कितने दंश झेले हैं. कितना सहन किया है. मेरी ज़िन्दगी कितनी मुश्किल है तेरी कितनी आसान. तुझे एहसास होगा कि मुझ पर क्या बीतती है जब तू दुनिया के सामने  कुछ और होता है और मेरे आगे कुछ.

इसका जो भाव है वो कोई ऐसी नई बात नहीं है,जो अब तक ना कही गई हो. मनुष्य ने जितना विकास किया है उसमें उसे ख़ुद का दुख दूसरे से बड़ा ही दीखता है. दूसरे की थाली में घी ज़्यादा ही दिखा है.इससे इतर दूसरी बात ये कि मानव मन इतना विशाल और संवेदनशील है कि लगभग प्रत्येक व्यक्ति ये सोचता होगा कि उसे कोई नहीं समझता, सामने वाला उसकी जगह होता तब उसे एहसास होता कि उसने कितने दंश झेले हैं। ठीक भी है मनुष्य की अपनी प्रवत्ति है उसे अपना स्पेस चाहिए समझने वाला चाहिए, इसी के बूते पर तो सैकड़ों विचारधाराएं दुनिया में चल रही हैं.
कई बार आप किसी के जितने नज़दीक जाते हैं आपको उतने ऐब नज़र आते हैं. शायद नज़रिया ही ख़राब हो ये कह ले या जो चाहे कहते रहें, ऐब तो नज़र आते हैं. जहाँ मधुरता ज़्यादा हो वहाँ मक्खियां तो पनपेगी ही। मतभेद होंगे, विचारधारा बटेंगी.
सारी लड़ाई विचारों की ही तो है, मनुष्य और जानवर में सोचने की शक्ति का ही तो अंतर मात्र है.

अगर कुछ देर एक-दूसरे की जगह आपस में बदलकर देख लें तो शायद कई तरह से चीज़े ख़राब होने से पहले ही ठीक हो जाए. भारत भूषण पन्त साहब का एक शेर है कि
"अभी तक जो नहीं देखे वो मंज़र देख लेते हैं
चलो आपस मे हम आँखें बदलकर देख लेते हैं"

अभी तक हम जो सिर्फ़ अपने नज़रिए से देख रहे हैं उसे थोड़ी देर के लिए बदलकर देख लें तो चीज़ें ख़राब ना भी हो शायद.
शायद!
यहाँ झोल ये है कि हम अतिवादी लोग हैं.हम सब एक रेस में लगे हैं, हमें जल्दी प्रतिक्रिया देनी हैं. क्यूँकि हमारी कंडीशनिंग ऐसी हुई है. क्रिया हो गयी, प्रतिक्रिया दो. जल्दी जवाब दो,नहीं तो सामने वाला आगे निकल जाएगा.
बस इसी चक्कर मे जहाँ थोड़ा पॉज लेना था, थोड़ा रुकना था, सोचना था, समझना था. वो सब नहीं हुआ. प्रतिक्रिया हो गयी.
ये क्रम आगे चलता है.
अब मनुष्य जो सोचता है उसकी मानसिकता वैसी ही होती जाती है. नज़रिया जैसा रखता है नज़रे वही दिखाने लगती हैं. 
फिर इसके बाद ज़िद, ईगो, सुपर ईगो...चीज़ें ख़राब होती है. नकारात्मकता बढ़ती है. सम्बन्ध ख़राब होते हैं. शब्द भी ख़त्म हो जाते हैं. हो चुके हैं.
-नितेश
31.01.2022
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Wednesday, January 19, 2022

चाय पीने इतना वक़्त

अगर मरने के बाद हम सोचते तो ये ज़रुर सोचते कि "काश मौत ऐसे यूँ अचानक से ना आ गयी होती।"
आ भी गई होती तो घड़ी भर का वक़्त देती साथ मे चाय पीने जितना। कहती कि कुछ पल हैं अभी तुम्हारे पास। रिलैक्स! चाय पीने इतनी देर रुका जा सकता है। काश कि मौत की प्रक्रिया में कुछ ऐसे पलों की रियायत होती, जिनमें अपनों को अलविदा कहा जा सकता। प्यार का चेहरा घड़ी भर याद कर लेते। उन लड़ाइयों के लिए माफ़ी मांग लेते मन ही मन, जिनके लिए ईगो के चलते सारी उम्र ख़ुद से मुँह बचाते रहे। उन किताबों को शुक्रिया कह पाते जिनके ना जाने कितने एहसान हैं।
उन लेखकों को मन ही मन कह पाते कि "हमारे मन एक जैसे हैं" जिन्होंने हमारे मन की बात तब कह दी जब हम उस बात को कहने के लिए शब्दकोश के पन्ने पलट रहे थे।
गुनगुना लेते कोई पसंदीदा शे'र।
यक़ीन दिला पाते किसीको कि हम उसे पाना नहीं चाहते थे बस कि पल भर उसके साथ होना चाहते भर थे। या उसके साथ होकर उसे छूकर देखना भर चाहते थे। कि ख़ुद को दिला सके यक़ीन कि वो है सचमुच, इस जहाँ में है। कल्पना भर नहीं है। सचमुच है।
कितना कुछ किया जा सकते है बस चंद पल में। लगता है मैं जितना सोच चुका हूँ उतना कुछ। और फिर ये पल ख़त्म हो जाते। मौत ने अपनी चाय की प्याली ख़ाली कर दी होती।
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नितेश
18.01.2022

Friday, January 14, 2022

भावुकता : एक खतरनाक रोग

रेणु मैला आँचल में कहीं लिखते हैं कि 
"भावुकता का दौर भी एक खतरनाक रोग है"
मुझे याद है कि भावुकता वश मैंने जब भी कोई फ़ैसला किया है,किसी के सामने कोई बड़ी बात कहीं है उसका परिणाम ख़राब ही रहा है.
दूसरी मज़ेदार बात, मुझे लगता है कि भावुकता में आदमी कम से कम सच ही बोलता है (या जो उसे सच लगता है)
और ये बात तो सिद्ध ही है कि सच बोलने से आज के दौर में परिणाम ख़राब ही निकलता है.

      भावुकता यानी भावों के प्रवाह में कहीं गयी बात. जितनी ज़्यादा भावुकता उतना ही ज़्यादा  नो फिल्टरेशन. ये भी समझने योग्य है कि जो व्यक्ति जितना अधिक भावुक होता है , उसमें सच्चा होने के उतने प्रबल चांस हैं. भावुक व्यक्ति सच्चा, ईमानदार, संवेदनशील होता है, लेकिन तर्क, रिश्तों के जोड़-घटाव, फ़ायदे-नुकसान में उतना ही कच्चा. बहुत कमाल की बात यह भी है कि जो व्यक्ति पहले-पहल भावुक, संवेदनशील होता है, एक वक़्त के बाद वो प्रैक्टिकल हो जाता है.
आख़िरश सभी को अपने-अपने रोगों से बाहर निकलना चाहिए. सच भी है भावुकता रोग ही तो है,नुकसान पहुँचाने वाला ख़तरनाक रोग.
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-नितेश
14 जनवरी 2022
7.22  pm

Tuesday, January 11, 2022

बोझ से मुक्त

तुम्हें खोना जैसे बहुत से बोझ से मुक्त होना हो.
तुम्हारे साथ तुम्हें ढोना और ख़ुद को भी.
जैसे एक थकान सी लगी रहती थी. अब लगता है कितना सुखद है ख़ुद को ख़ुद के हिसाब से चलाना.
सबको लगता है तुमसे बिछड़कर मैं उदास हूँ,
जबकि तुम्हारे साथ मैं ज़्यादा उदास था.
अजीब है ना !
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11जनवरी 2020, 12:00 AM

Monday, January 10, 2022

प्रार्थनाएं जो कभी ईश्वर ने नहीं सुनी

प्रार्थनाएं जो कभी ईश्वर ने नहीं सुनी..
एक ज़रूरी ई-मेल (जो शायद 3-4 दिन पहले आया हो) देखने के लिए मेलबॉक्स खोला.
तमाम तरह के ग़ैर-ज़रुरी मेल्स के बीच ज़रुरी मेल खोजना मुश्किल जान पड़ा. अचानक ज़ेहन में आया कि स्पैम (अवांछित फोल्डर) में देख लूँ. कुछ ही सेकण्ड्स में मिल गया.
              इसी प्रक्रिया में ख़याल आया कि वे ज़रुरी प्रार्थनाएँ जो कभी पूरी नहीं होती, क्या ईश्वर तक पहुँची होंगी कभी?
क्या ईश्वर भी कभी स्पैम में अनसुनी/ अवांछित प्रार्थनाएं खोजता होगा?
क्या हुआ होगा उन निवेदनों का, जो ईश्वर ने प्रथम दृष्टया देखकर "....बाद में सोचूँगा" जैसे जुमले से पेपरवेट के नीचे दबा दिए हो और भूल गया हो. 
कितनी प्रार्थनाएँ, कितने मन्नत के स्वास्तिक, धागे अपनी जगह पर प्रतीक्षा कर रहे हो कि एक दिन ईश्वर लोगों के भेजे हुए सभी प्रार्थनाओं, e mails ,मन्नतों को स्वीकार कर ले.
*****
१० जनवरी, २०२०. 
6.22 pm
(छायाचित्र - साभार  इंटरनेट)

इंतज़ार

इंतज़ार.......इंतज़ार शीर्षक इसलिए कि अभी कोई ठीक ठाक शीर्षक सूझ नहीं रहा. वैसे भी सब कुछ ठीक ठाक से ज़्यादा कुछ है भी नहीं, कहीं पर भी नहीं।

वक़्त रेत की तरह  मुठ्ठी से फिसलता जाता है, उम्मीदें ताश के पत्तों के महल की तरह बिखरती रहती है, बार-बार...लगातार।

बना रहेगा इंतज़ार, जैसे अब तक था।

हाँ उम्मीद नहीं रहेगी अब के एक दिन अचानक से कोई, कभी नहीं जाने के लिए लौट आए और दिन पलट जाए।

जितना जिसके हिस्से का इंतज़ार था , उतना उसका किया जा चुका। 

ज़िन्दगी किसी बच्चे की मुट्ठी में छुपाई रेत है, 

ताश के पत्तों के महल की मानिंद ख़्वाईशे हैं.

अब फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता किसी चीज़ का ये सोचता हूँ तो लगता है शायद यही ढूंढ रहा था ख़ुद में.

सोचता हूँ कभी फ़र्क पड़ता था ब्लॉक होने से,

किसी के फ़ोन ना उठाने से. अब एक ऊब होती है किसी से बात करने में, किसी से नहीं सब से.

कुछ एक दोस्त हैं जिनसे तबियत मिलती है .

एक है जो बिल्कुल अपने जैसा लगता है, उससे ना रश्क़ होता है ना ऊब. लगता है ख़ुद के हिस्से से बात करना.

एक सिरीज़ आयी थी समानांतर. वैसा ही कुछ.

ज़िन्दगी ठीक चल रही है कुल जोड़ घटाकर.

अब वैसी दीवानगी नहीं होती किसी के लिए, ख़ुद के लिए होता है सबकुछ.

पर ठीक ठीक अब भी नहीं पता कि क्या ढूंढ रहा हूँ. कभी जिसके लिए जीवन का सबकुछ लुटाया जा सकता था अब कुछ ख़ास फ़र्क़ क्यूँ नहीं पड़ता. 

क्यूँ इतनी पसन्द बदल गयी हर एक चीज़ में.

वैसे तुम्हें बताना बस यह था कि अब सफ़ेद पसन्द नहीं उतना, अब नीला रंग सबसे ज़्यादा पसंद है। मुझे ख़ुद तक पहुँचाने का शुक्रिया।

****

१० जनवरी, 2022

सुबह के ४ बजे


(तस्वीर : साभार internet )


Tuesday, July 2, 2019

बारिश

ब से बारिश....

         शाम के वक़्त अक्सर बारिश भी प्रेम करने वालों पर मेहरबान हो जाती है..थोड़ी-बहुत नहीं घनघोर बारिश..!!!
        मैं कभी-कभी ऐसी बारिशों में उसे स्टॉप तक छाता लेकर लेने जाया करता था। वैसे स्टॉप और मेरे फ़्लैट की दूरी महज़ 500 मीटर की रही होगी, जिस तक पहुँचने में कुछ 5-6 मिनट का वक़्त लगता था। बारिश के दिनों में पूरी कॉलोनीज़ के रोड़ पर पानी घुटनों तक भरा होने के कारण ये वक़्त बढ़कर 10-12 मिनट हो जाया करता था। जब भी ऐसे वक़्त उसे लेने जाना हो वक़्त फिर सिमटकर 5-6 मिनट हो जाया करता था।

        शायद वो कभी भीग भी जाती तो दुनिया का इतना नुकसान नहीं होता,
लेकिन उसके भीगने की वजह से हम दोनों एक साथ बीमार नहीं होना चाहते थे।
शुरुआती एक-दो कॉल के बाद मैं उसके बिन बुलाये ही छाता लेकर  उसे लेने पहुँचने लगा। यहीं जुलाई की शामें थी।

       एक ऐसी शाम थी। जब बहुत तेज़ बारिश हो रही थी। अचानक मुझे याद आया कि उसके ऑफ़िस से आने का वक़्त हो गया है। मैं नींद से उठा छाता लेकर निकल पड़ा। जहाँ आम तौर पर बारिश में उसके लिए मैं ये दूरी 5-6 मिनट में तय कर आज 2 से 3 मिनट ही लगे थे। पता नहीं कैसे पर शायद प्यार सचमुच दूरी, समय सब कम कर देता है। आपको एहसास भी नहीं होता कि आप कितना सफ़र तय कर चुके हैं।

          मैं स्टॉप पर खड़ा रहा।वो नहीं आई।मैं बार-बार टाइम देख रहा था..10 मिनट.....15 मिनट..20 मिनट...30 मिनट.. हो सकता है आज लेट हो गयी हो और मेरे दिमाग मैं ये ख़याल भी नहीं आया कि एक फ़ोन कर लूँ, ये तो एक बहुत आम-सी बात थी,पर पता नहीं क्यों मैंने नहीं सोचा।
40 मिनट...42 मिनट..45 मिनट।
अब मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगी। वो नहीं आई, आती भी कैसे।

46 मिनट.. 47 वें मिनट मुझे अचानक जब कुछ याद आया, दिमाग़ ने काम करना शुरू किया, तब मेरे पैरों से ज़मीन खिसक गई।

      क्या? तो क्या ये दो साल पहले की बात है जब मैं उसे यहाँ लेने आया करता था। उसे शहर छोड़े हुए 17 महीने हो गए हैं और मैं उसका इंतज़ार इस स्टॉप पर कर रहा था।
     
      प्यार में सचमुच वक़्त का पता नहीं चलता। अब भी वो मुझसे बहुत दूर किसी शहर में है, पर लगता है यहीं तो है।
________________
न से नितेश
#दुलप्रेक (दुःखभरी लघु प्रेम कथा)

Sunday, November 25, 2018

तुम्हारे बिना स्वर्ग का क्या करेंगे..


आसपास पटाकों की आवाज़ थी,शोर नहीं था,,ख़ुशियाँ थी!! शहर से गांव तक का पूरा रास्ता सजाया हुआ था। गाँव में उत्सव था। लोग एक-दूसरे को मिठाइयाँ बाँट रहे थे।
******

कुछ दिन पहले हम एक कॉफ़ी शॉप जैसे किसी रेस्तरां में बैठे थे। मैं बहुत कुछ कहना चाह रहा था पर लफ़्ज़ साथ नहीं दे रहे थे।
मेरे बोलने से पहले ही..
तुम- ''मैं तुम्हें इस हाल में नहीं देख सकती,तुम्हारे दुःख की वज्ह नहीं बन सकती उम्र भर!!''
मैं- ''ह्म्म्म्म तो..?''
तुम- ''चलो चलकर शादी कर लेते हैं!!''
अगले कुछ घण्टों में हम एक फूलों की दुकान के सामने थे। जो सड़क के उस पार थी।
मैं कुछ गुलाब और फूल मालाएँ लेकर तुम्हारी और बढ़ रहा था! तुम्हें देखकर मुस्कुराते हुए।
अचानक....
एक गाड़ी ने मुझे जोरदार टक्कर मार दी..

अगले कुछ घण्टे बाद..
आसपास बहुत से लोग..डॉक्टर्स, नर्स, रिश्तेदार,दोस्त और तुम...
मुझे लेटाकर जल्दी से वेंटिलेटर पर रखा जा रहा था.... शोर में बस ये सुनाई दे रहा था कि मेरी हालत बहुत नाज़ुक है! बचने की संभावनाएं नगण्य!मैं कोमा में था।

अगले तीन दिन हॉस्पिटल टाइप के मनहूस माहौल में तीन साल जैसे गुज़रते रहे।

चौथे दिन मैंने हरकत करना शुरू की..फिर से भीड़।
तुम मेरे सामने थी।
(मैं सबकुछ भूल चूका हूँ हादसे के दिन के बाद का। और जो याद है तबसे अब तक का वो ये कि..)
मैं- तुम यहाँ हो, मुझे कोई मिला था जो भगवान होने का दावा कर रहा था।
(सभी मेरी तरफ आश्चर्य और ख़ुशी से देख रहे थे, मैं बस बोलता जा रहा था, क्या? पता नहीं)
मुझे एक बहुत बड़े वेटिंग रूम में बिठाया गया, फिर सफ़ेद कपड़े पहने कोई आया, जिसने कहा कि तुम्हारे भगवान तुम्हे अंदर बुला रहे हैं, मैं अंदर गया ये सोचकर कि ज़रूर तुम कोई नाटक कर रही हो, या मुझे कोई surprice देने वाली हो। वहाँ गया तो वहाँ एक बहुत तेज़ आभामण्डल के कोई सिद्धपुरुष बैठे थे, लग रहा था मानों हज़ारों सालो से किसी तपस्या में लीन हो।)
  वो- हम भगवान हैं, ईश्वर!
मैं -नहीं वो तो अभी मेरे साथ थी, मैं जिससे प्रेम करता हूँ! जिससे मैं शादी करने जा रहा था और तुमने अचानक मुझे यहाँ बुला लिया, अब जल्दी बोलो मेरे पास ज़ियादः वक़्त नहीं है। मेरी शादी होने वाली है! मेरी प्रेमिका मुझे खोज रही होगी।
वो- बच्चे! मैं जानता हूँ तुम मुझसे ज़ियादा मानते हो उसे, पर उसकी फ़िक्र मत करो। तुम मर चुके हो अब।
मैं- ये कहाँ का न्याय है, तुम्हारी बेरंग दुनिया में मैंने बस एक रंग माँगा था, तुमने वो भी छीन लिया,, तुम ईश्वर नहींहो सकते। हो ही नहीं सकते!! शैतान हो तुम। जाओ अपनी दुनिया में जाकर देखो। किसी को प्रेम करके देखो। असल तपस्या है प्रेम। प्रेमी होने का
दुःख देखों, तब स्वयम् को ईश्वर कहना। तुम शैतान  से भी निर्दयी हो।

वो- तुम्हे अगले जनम में वही मिलेगी, तुम्हारा इंतज़ार करते हुए। अब जाओ आगे स्वर्ग का दरवाज़ा है।

मैं- नहीं चाहिए ये तुम्हारा बेकार स्वर्ग, जहाँ मेरी प्रियसी है वही मेरा स्वर्ग है।

(दो दरबान मुझे पकड़े हुए एक दरवाज़े की तरफ ले गए, और मुझे धकेल दिया)

फिर से हॉस्पिटल...
मैं - बस मुझे इतना ही याद है!!

सब रोने लगे और मुझे गले लगाने के लिए बढ़े। हम शहर के हॉस्पिटल से घर की और निकल पड़े और ये सफ़र ज़िन्दगी का था। बाकि सब कहानियाँ....!!

तो बस यही था,, कल रात जो ख़्वाब देखा था!!
कल रात एक ख़्वाब देखा था।

-न से नितेश🙂

Sunday, November 11, 2018

मैं और दूसरा मैं .

रात के ढाई बजे दरवाज़े पर दस्तक होती है...टक-टक-टक-टक

अचानक याद आता है कि मेरे कमरे में एक दरवाज़ा है जो मुझे क़ैद करके अपना होना भुला देता है। मैं दरवाज़े की तरफ़ नहीं बड़ता हूँ इस वक़्त कौन आया होगा, मेरा धोका होगा।
मैं अपने चारों और कुछ किताबों को रखकर दुनिया से बहुत दूर निकल चुका होता हूँ।
एक शब्द मन में आता है.....प्यास
मैं मटके की तरफ़ बढ़ता हूँ, वहाँ रखे हुए आईने पर नज़र पड़ती है। चेहरे को छू कर देखता हूँ, बेतरतीब बढ़ी हुई दाढ़ी और कई सारी झुर्रियां। याद नहीं आता पिछली बार कब ठीक से संवारा था ख़ुद को। तुम्हारे जाने और फिरसे लौट आने के बीच कई बार ख़ुद से झगड़ा हुआ और फिर एक नाउम्मीदी हो गयी ख़ुद से। तबसे ख़ुद की तलाश में हूँ। एक बच्चा जिसे भीड़ से डर लगता था, अब भीड़ के सामने खड़ा होता है तो लोग झूम जाते हैं। पर वो बच्चा सच में खो गया है। उसका होना ये नहीं था कि उसे नाम मिले अख़बारों और दुनिया से पहचान मिले, वो लोगों में उस बच्चे को ढूंढ रहा है जो उसने कहीं अनजाने में पीछे छोड़ दिया।
तुम्हारे जाने और लौट आने तक के सफ़र में उसने ख़ुद को कहीं रख दिया और भूल गया वो जगह जहाँ रख छोड़ा था।

सामने दीवार पर कुछ चुनिंदा तस्वीरें लगी हैं, जिनमें ज़िन्दगी की कई सच्चाइयाँ एक शुरुआती सफ़र उम्मीदों से भरा हुआ, वक़्त के पैरों के निशान जिनमें वक़्त से मिली हुई दुत्कार,, और एक उदास सूखा हुआ पेड़ है। दीवारों पर सीलन लग चुकी है बारिश की वजह से।
ठीक वैसी जैसी मन की दीवारों पर है।
बाकि सब बेजान।

अचानक दरवाज़े पर फ़िर दस्तक होती है इस बार मैं उठकर जाता हूँ दरवाज़ा खोलता हूँ और सामने ख़ुद को पाता हूँ।
मैं अपना स्वागत करके ख़ुद को ख़ुद के पास बिठाता हूँ। मैं और पुराना मैं एक-दूसरे को बहुत ग़ौर से देखते हैं।
मैं दूसरे मैं को अपनी एक ग़ज़ल सुनाता हूँ वो ''मैं'' कोई ख़ास जवाब नहीं देता कहता है- तुम अब वो मैं नहीं रहे, मैं तुमसे मिलने आया था, मुझे पता था तुम मुझे ढूंढ रहे हो'' और अचानक उठकर बाहर निकल जाता है, उसे रोकता नहीं हूँ । मैंने उसे जाने दिया फिर बाहर गया, उसे आवाज़ लगाई,, सुनों तुम कहाँ रहने लगे आजकल।
वो ''मैं'' पलटकर कहता है
'' मैं कुछ सालों से तो .......''

अचानक अलार्म बजती है और नींद टूटती हैं।।

-न से नितेश

Saturday, May 12, 2018

तुमसे किया वादा निभाऊंगी (भाग-1)

तुमसे किया वादा निभाऊंगी
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                          1
ज़िन्दगी एक रफ़्तार लिए आगे-आगे दौड़ रही थी, जबकि कोई ख़्वाहिश बची नहीं थी जिसके लिए परेशान हुआ जाता। बस कुछेक ज़रूरत भर की ज़िम्मेदारियाँ पुरी करने के लिए क़तरा भर काम थे। अपने पीछे कुछ ज़िंदगियाँ थी, जिसके लिए बचपने और सपनो का मुलायम गला घोंट दिया गया था।
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वो हमेशा सुबह और शाम दहलीज़ पर बैठे हुए सड़क पर आते-जाते लोगों को देखा करती। गली में फुटबॉल खेलते, छतों पर पतंग उड़ाते बच्चों को देख अपने बचपन के दिनों को याद कर मीठी-सी यादों में गुम हो जाती। कुछ दोस्त जो उसने एक-एक कर अपने से दूर कर दिए थे , उनकी ख़ुशनुमा ज़िन्दगी के कयास लगाती रहती और अपनी ज़िन्दगी के सबसे प्यारे लोगों को जो अब उसकी ज़िन्दगी का हिस्सा नहीं रहे थे, सोचकर गाल भिगोती।

वो अपने मन में कल्पनाएँ कर कहीं दूर मस्ती के पल सोचती। अब वैसे दिन नहीं होते हैं जब दोस्तों से बात हो या कहीं घूमने जाने की योजनाएं बने ।

वो कभी ऐसी नहीं थी और उसे होना भी नहीं चाहिए था, वो कभी अपने चुलबुलेपन और नटखट मिज़ाज से कई दिलों को लूट लिया करती थी । आँखों में सिर्फ काजल या आई लाइनर और हल्का-सा मैकअप । बातें बच्चों सी बिल्कुल। हंसे तो फूल खिल पड़े; रोये तो बिजलियाँ कौंध जाये।
वो हमेशा उल्लास से भरी रहती। कभी रुकने का नाम नहीं कहीं। बड़े-बड़े सपने।
*****

एक दिन ऐसे ही किसी बात पर हँसते हुए अचानक चुप हो गयी। आँख से आँसू चू पड़ा।
वाक़ई तब लगा कि छोटी-सी ज़िन्दगी और मौज मस्ती की उम्र में ज़िम्मेदारियां भी हो सकती है। फिर कुछ दिन उसे देखा नहीं किसी ने। अगली बार जब मिली तो एकदम दुबली-पतली सी। आँखों में काजल फैला हुआ और ना बातों में वो बात। हम सब अब भी कूल ड्यूड बने थे। पर वो वक़्त से पहले बड़ी हो चुकी थी।
हर दफ़ा से उलट इस बार बात करते हुए वो भावुक नहीं हुई। मैं एकटक उसकी बातें सुन रहा था, बीच-बीच में गाल भिगोकर उसके दुपट्टे के किनारों से आँखों को पोंछता हुआ। वो मुझे ज़िन्दगी के दूसरे पहलू समझाती हुई कि ये सब उसके लिए कितना ''नॉर्मल'' है और मेरे नहीं समझने पर उसकी आँखों से मोतियों की धार फूट  पड़ी ।
उसने वादा लिया कि तुम्हारा एक भी आँसू अगर  आँख से बाहर आया तो मेरी आँखों से सैलाब फूट पड़े। अब दोनों चुप थे।

अचानक ज़िन्दगी में कुछ और तब्दीलियां हुई पर हम अपने अंदर रोना सीख चुके थे ।।
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-नितेश✉

Friday, April 13, 2018

उदासी भरी शाम..!!

उससे मिलना और बिछड़ जाना पिछले किसी जन्म में किये गए सबसे बड़े पाप की सज़ा थी..। ये सोचते हुए मैं नियति को महसूस किया करता ।
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रिश्तों में लिपुलेख दर्रे जितनी दरारें पड़ चुकी थी। दुनिया भर का प्रेम भी अब उन दरारों को भरने में ना-काफ़ी था।

हमने कई बार आख़िरी मुलाक़ात की..अब उससे अकेले में जब भी मिलना होता था तो बात नहीं होती थी कुछ भी। सबकुछ जाना जा चुका था या मिलने के पहले पूछा जा चुका  होता था..होती थी बस एक चुप्पी की जगह दोनों के ख़ालीपन के बीच।
आसपास बहुत लोग नहीं होते थे..होते भी थे तो अपरिचित।

कई दिनों के बाद एक उदासी भरी शाम को और ज़्यादा उदास बनाने के लिए मुलाक़ात का वक़्त और जगह तय हुई थी। कॉफ़ी आर्डर की गयी..दोनों चुपचाप नज़रे चुराकर देखते  एक-दूसरे को।

बैकग्राउंड में हल्की धीमी आवाज़ में सुरीली ग़ज़ल "होशवालों को ख़बर क्या बेख़ुदी क्या चीज़ है" प्ले हो रही थी।
उसकी ख़ूबसूरती ने फिर से प्यार में गिरने को मजबूर किया जब ग़ज़ल के एक मिसरे  "आज जाना प्यार की जादूगरी क्या चीज़ है" के साथ मेरी नज़र उसके कॉफ़ी लगे हुए होंठो पर अटक गयी।

बीच-बीच में कुछ औपचारिक बातें। आसपास प्रेम में डूबे जोड़े। मस्ती करते कुछ कॉलेज के लड़के-लड़कियाँ।
  कैफ़े में लगी पेंटिंग्स को देखते हुए बीच-बीच में मन भारी हो जाता। कभी ये सोचकर कि अब कभी मिलना नहीं होगा। अब वो पहले सा एहसास मर चुका था। जब घण्टों बैठ कर दोनों बतियाते रहते थे। अब लगता है कि जेल में आ गए है.. मिलने ही नहीं आना था। मैं मन ही मन मिलने के लिए "ख़राब" किये वक़्त और पैसे का हिसाब जोड़ने लगता। सिगरेट पीने की तलब लगती। होंठ सूखने लगते। बड़ी मुश्किल से पर्स की तरफ हाथ जाता और एक बिसलेरी बुलाई जाती।
फिर एक बार क़ैदखाने में फ़िज़ूल की बातें और चुप्पी का सिलसिला शुरू होता। उसके माथे की सिलवटें बताती कि उसे किसी पुराने दोस्त से मिलना जाना होता था। मुझे किसी "मानाकि" वाली गर्लफ्रेंड के साथ डेट पर।
दोनों बातें ख़त्म होने का इशारा अपनी घड़ी देखकर करते एक-दूसरे को।
कैश काउंटर पर पेमेंट किया जाता और अपनी-अपनी राह जाने से पहले कहते कि बहुत अच्छा लगा मिलकर।

हाँ जाते-जाते मैंने उससे ये भी कहा कि मैंने तुमसे प्रेम किया ही नहीं कभी
-नितेश कुशवाह "निशु"

Thursday, April 12, 2018

मन का फ्लैशबैक

*मन का फ्लैशबैक*
by-- नितेश कुशवाह
special thanks for ending point-- ख़ुशबू मालवीया दी
*****
''तू कब से मर गया है मेरे भीतर,
मैं तेरी लाश ख़ुद में खोजता हूँ।''

बाद उसे खोने के कुछ बचा नहीं। किस्मत की लकीरे जैसे हाथों से गिर चुकी थी। सब ख़त्म होता जा रहा था। उदासी बदन से लिपटी रहती थी।
___________
बरसात के दिन थे। शाम का वक़्त 4-5 बजे के क़रीब। ख़ूब बारिश हो रही थी। मैंने अपने पड़ोसी से छाता माँगा और बस स्टॉप की तरफ निकल पड़ा। बहुत जल्दी-जल्दी तेज़कदमी के साथ। दुरी 2 km पैदल जाने में 15 मिनट लगते थे। पर किसी की फ़िक्र होती है तो आप सड़को पर हद तक पानी भरा होने के बावजूद भी 15 मिनट का सफर 6-7 मिनट में तय कर सकते है। परिस्तिथियां प्रतिकूल होने के बावजूद। बस स्टॉप पर पहुचने पर जिसे लेने आया था, जिसकी फ़िक्र थी उसे ज्यो हो फ़ोन लगाने के लिए  मोबाइल निकाला तो एकाएक कुछ याद आया।

दिमाग चुप एकदम। आँखों के आगे अँधेरा छाने लगा। किसी दीवार के सहारे खड़े रहने की कोशिश की।
कभी-कभी हमारा दिल-ओ-दिमाग कुछ सच्चाइयों को स्वीकार नहीं कर पाता। हम हमेशा वैसे ही बने रहना चाहते है। हम अपने झूठ के मयारों को तोड़ नहीं पाते।

पिछली बारिश छाता लेकर उसे लेने आया करता था इस स्टॉप पर ताकि वो भीग ना जाए।
याद आया कि जिसके ख़यालो में पागल होकर यहाँ आया था वो शहर छोड़कर एक साल पहले जा चुकी है।
अबकी बारिश आँसुओं की भी बहा ले गयी अपने साथ...
*****
ख़्वामख़्वाह की ये बारिश अब तो बदमिजाज़ सी लगती है,
शबनम सी गिरती ये बूंदें भी
मेरे बदन पर अब तेज़ाब सी लगतीं हैं, वो कहीं दूर बैठी है फिर भी क्यों मेरे पास सी लगती है ....

Monday, April 2, 2018

हारा हुआ आदमी

तुम्हारी ग़ुस्से भरी नाराज़गी से लगता है कि हममें कोई रिश्ता अब भी ज़िंदा है।

भरी दोपहरी।मार्च के आख़िरी दिन। बीमार करने पर उतारू धूप और सन्नाटे में चीख़ती तपन।
दोपहर का एक बजा होगा शायद।
किसी का साथ पाने की ज़िद में पाग़ल हुआ मन। और मेहनत करता शरीर। उस पर रूठी हुई नियति कि मानो चिड़ा रही हो। हर जगह हँसते पहचान के कुछ लोग।
whatsapp पर लगातार ब्लिंक करते msg।
एक हारा हुआ आदमी.....
आसपास से गुज़रते हुए मुसाफ़िर।

एकाएक एक अधेड़ आदमी सड़क पार करते हुए सड़क पर आ रहे ट्रक से जा टकराया। ग़लती ट्रक ड्राईवर की नहीं थी। आदमी की भी नहीं। जैसा नियति ने चाहा वैसा हुआ। ख़ैर है कि उसको बाहरी चोट लगी थी । बाहरी चोट में बचना आसान होता है, मन की चोट के मुक़ाबले।
अचानक याद आ धमका कि ऐसे ही कभी मैं अपना अच्छा वक़्त पार करते हुए तुम्हारी टक्कर की भेंट चढ़ा था। बहुत सी अंदरुनी चोटें मन में पड़ गयी। धीरे-धीरे जब सम्भला तो तुम्हे अपना हमराह बना पाया । हालाँकि कोई कॉन्ट्रैक्ट साइन नहीं किया था। 
वक़्त के साथ बेतरबीती ख़त्म होने लगी। सबकुछ सलिखें से होने लगा। निकल पड़ा ख़ुद को सभ्य और क़ाबिल बनाने के सफर में। आगे के लिए कोई वादा नहीं। वादा अक्सर काबिल लोग करते है , नालायक लोग सरप्राइज देने का सोचते रहते है।
वक़्त बीता।
महीना-दो महीना-एक साल-डेढ़ साल।
काबिलियत जैसी किसी शै का दूर- दूर तक पता नहीं।
एक दिन सब ठीक होने वाला था कि...ख़ैर ग़लती तुम्हारी नहीं थी। तुमने 'आईने' वाला रवैया अपना लिया। धीरे-धीरे तुम्हे एहसास हुआ या यूँ कहे कि हालात मेरे हक़ में होने लगे।
मुझे शौहरत मिलने लगी। सबकुछ ठीक से चलने ही लगा था। कबिलियत के बहुत पास। एकदम पास। 3-4 हाथ की दुरी।
कि फिर वही मनहूसियत।

ख़ैर...तुम्हारी ग़लती नहीं है कोई भी। नियति ने मुँह फेर लिया हमेशा के लिए। एक-एक कर हर उम्मीद टूटती गयी सब कुछ ठीक होने की। मैं कुछ नहीं कर पाया कभी सिवा  तुम्हारे साथ रोने के। एक छोटी सी ख़ुशी मैं दे सकता था , पर फिर से वही। साली क़िस्मत। शायद मैं बहुत कुछ बदल भी सकता था। पर नियति के   इशारे देर से समझा। और एक-एक कर सबकुछ तुम्हारे हाथों से जाता गया। अब करने को कुछ नहीं है बस एक और उम्मीद के। उदास मत हो दिन फिरेंगे किसी दिन। हम जीतेंगे देख लेना। बस तुम हिम्मत मत हारो। कुछ दिन और। अभी बस माफ़ नहीं कर पा रहा ख़ुद को। तुमसे किया वादा गूँज रहा है अब भी। बाकि कोई आवाज़ कहीं से नहीं आ रही।
सब चुप हो गए।

Thursday, March 15, 2018

हम हारे हुए लोग है..

"जब हार रहे हो तो जानबूझकर गिर जाओ, बहाना तो मिल ही जाता है।"
..फिर एक दिन ऐसा कोई बहाना करके हम ख़ुद पर झूठा गर्व जताते है। एक दिन वो वादे भी भूला दिए जाते है, जिसे भविष्य की सबसे मज़बूत नींव समझ लेते है।
*****
फेसबुक का On This Day वाला फीचर कभी-कभी बुरी यादों को भी सामने ला खड़ा कर देता है।
     जिसे हमें भूलने में अरसा लगा हो वो बातें भी हम नहीं भूल सकते। दरअसल हम भूलें ही नहीं थे, हम ढोंग कर रहे होते है।
हम बड़े हो चुके होते है उन "नादानियों"(?) के लिए कहीं भी जगह नहीं बचा पाते....।
*****
सब खेल रास्तों का होता है और एक छोटी-सी गड़बड़ी से तय होता है ..वो जो शायद नहीं होना था या होना था..??
  हम कभी सोच नहीं पाते कि सही क्या है..फिर स्वीकार करने के सिवा कोई चारा नहीं होता तो चुपचाप ख़ुद को समझाते है कि जो हुआ अच्छा हुआ।
****
हम हारे हुए लोग है, ऐसे लोग जो आसानी से साबित कर सकते है कि हमारी हार में हमारा कोई दोष नहीं था।
हार-जीत का क्या है वो तो चलती रहती है। एक सिक्के के दो पहलू है।
हाँ सिक्का वही, जिसे उछाल कर हम ज़िन्दगी के फ़ैसले लेते है कभी-कभी। और फिर उन्हें मानते नहीं है या तब तक उछालते है जब तक वही परिणाम ना आए,जो हम पहले से चाहते है।

हम लोग दोगले क़िस्म के बुरे इंसान है। सो नियति को भला-बुरा कहना हमारे हक़ में नहीं है। चलने दो जो हो रहा है। कहीं चलकर चाय पीते है इस बकवास में कुछ नहीं रखा।
*****
सुनों वो सिक्का खो गया है जिससे तुमनें  फैसला किया था उस दिन, अगर मिले तो लौटा देना। उसे सम्भाल कर रखूँगा।
-नितेश कुशवाह 'निशु'
8 मार्च 2018
दोपहर और शाम के बीच का वक़्त
【 5 मार्च 2016 की एक पोस्ट पर नज़र पड़ने के बाद लिखी गयी बकवास】

डिलीटेड यादें

**** दुनिया ख़त्म होने को थी, कई तरह की प्राकृतिक घटनाएँ  होने की ख़ास वजह  थी शायद ये कि मौजूद तमाम तरह के निशान मिट सके।हमेशा के लिए। फिर सद...